गुरुवार 7 मई 2026 - 15:25
अधिकांश मुस्लिम शासक हमेशा मुनाफिक और गुमराह रहे हैं

इतिहास का सबसे बड़ा दुखांत यह है कि बातिल (असत्य) हमेशा तलवार से कम और प्रचार-प्रसार (प्रोपेगंडा) से अधिक जीतने की कोशिश करता है। यज़ीद जानता था कि हुसैन (अ.स.) को मार डालना आसान है, लेकिन हुसैन (अ.स.) के संदेश को खत्म करना मुश्किल है, इसलिए उसने पहले लोगों के दिमाग खरीदे, विवेक (अंतरात्मा) को सुलाया, धर्म को दरबार का गुलाम बनाया, और फिर कर्बला की घटना को अंजाम दिया।

लेखकः मौलाना करामत हुसैन शऊर जाफ़री

हौज़ा न्यूज़ एजेंसी | रसूल-ए-ख़ुदा (स) से लेकर वर्तमान समय तक हक और बातिल की एक निरंतर चलने वाली तारीख:

जब रसूल-ए-ख़ुदा (स) ने मक्का की ऊबड़-खाबड़ वादियों में "क़ूलू ला इलाह इल्लल्लाह तुफ़लिहू" (कह दो अल्लाह के सिवा कोई माबूद नहीं, तुम्हें सफलता मिलेगी) की पुकार लगाई थी, उस समय धरती पर सबसे बड़ी कमी "सच्चे ईमान वालों" की थी। अबू लहब जैसे धनवान और अबू जहल जैसे प्रभावशाली लोग उस समय अरब के सरदार समझे जाते थे। लेकिन रसूल-ए-ख़ुदा (स) के साथ खड़े होने वाले अधिकतर वे लोग थे जो दुनिया की नज़र में कमज़ोर, गरीब और बेसहारा थे; जैसे बिलाल (र), अम्मार (र), सलमान (र), मिक़दाद (र) और अबू ज़र (र। क़ुरआन ने इसी हकीकत को बयान किया: "और उनके साथ ईमान नहीं लाए मगर बहुत थोड़े लोग।"

मदीना में इस्लाम एक सरकार बन गया, अज़ानें बुलंद होने लगीं, मस्जिदें आबाद हो गईं, लेकिन क़ुरआन बार-बार चेतावनी देता रहा कि हर "कलमा कहने वाला" मोमिन नहीं होता। सूरए मुनाफ़िक़ून नाज़िल हुई तो गोया मदीना के चेहरों से नक़ाब उतर गया। क़ुरआन ने फरमाया: "और मदीना वालों में कुछ ऐसे भी हैं जो निफ़ाक़ (पाखंड) पर अड़े हुए हैं।"

फिर वह दिन आया जब ग़दीर के मैदान में लाखों की भीड़ ने अली (अ) के हाथ पर बैयत की, "मन कुन्तो मौलाहू फ़हाज़ा अलिय्यून मौलाहू" (जिसका मैं मौला हूँ, यह अली उसके मौला है) की आवाज़ आसमानों से टकराई, लेकिन रसूलुल्लाह (स) के परदा फरमाने के कुछ ही दिनों बाद मस्जिद-ए-नबवी का माहौल बदल गया। कल तक "या अली" कहने वाले ख़ामोश थे, और दर-ए-फ़ातिमा (स) पर आग ले जाने वाले ज़्यादा थे। हज़रत अली (अ) अकेले खड़े थे; उनके पास हक था मगर अक्सियत (बहुमत) नहीं। अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली (अ) का यह दर्दनाक बयान नहजुल बलाग़ा के खुतबा-ए-शक़शक़िया में मौजूद है, जहाँ आप फरमाते हैं: "तो मैंने सब्र किया, इस हाल में कि आँख में काँटा चुभ रहा था और गले में हड्डी फँसी हुई थी, और मैं अपनी विरासत को लूटता हुआ देख रहा था।"

फिर तारीख ने देखा कि हर इमाम (अ) अपने ज़माने में हक का चिराग था, मगर उस चिराग के परवानों से ज़्यादा तमाशाई थे। इमाम हसन (अ) ने जब सुलह की तो उनके ही लश्कर ने ख़ेमा लूट लिया। इमाम हुसैन (अ) ने कर्बला में आवाज़ दी: "क्या कोई है जो हमारी मदद करे?" तो हज़ारों नमाज़ियों, क़ारियों और हाजियों के बीच सिर्फ 72 वफादार निकले। बाकी सब या तो यज़ीद के लश्कर में थे या ख़ामोश तमाशाई।

इमाम ज़ैनुल आबिदीन (अ) के दौर में मदीना के बाज़ार आबाद थे मगर कर्बला के असीर (बंदी) अकेले थे। इमाम बाक़िर (अ) और इमाम सादिक़ (अ) ने ज्ञान के समुद्र बहाए, हजारों शागिर्द पैदा किए, मगर जब वक़्त-ए-इम्तिहान आया तो मुख़लिस (सच्चे) बहुत कम निकले। इमाम मूसा काज़िम (अ) ज़िंदानों में रहे और उम्मत ख़ामोश रही। इमाम रज़ा (अ) को वलियत-ए-अहदी के सुनहरे जाल में क़ैद किया गया और अक्सरियत ने इसे "इज़्ज़त" समझा।

यह तारीख सिर्फ अतीत की कहानी नहीं, बल्कि हर दौर का आईना है। समय के चेहरे बदलते रहे, पोशाक बदलती रही, सल्तनतों के नाम बदलते रहे, मगर हक और बातिल की जंग कभी नहीं बदली। कल अबू सुफ़यान मक्का के बाज़ारों में इस्लाम के ख़िलाफ़ साज़िश करता था, आज वही किरदार विश्व शक्तियों के आयानों में बैठा मानवता के ख़िलाफ़ फैसले करता है। कल यज़ीद के दरबार में हक को "बग़ावत" कहा जाता था, आज इसी हक को "आतंकवाद" और "चरमपंथ" के नाम से बदनाम किया जाता है। कल इब्ने ज़ियाद सोने और ओहदों के ज़रिये ज़मीर ख़रीदता था, आज मीडिया, सियासत, डॉलर और वैश्विक संस्थान इंसानों के ईमान, फ़िक्र और गैरत का सौदा कर रहे हैं।

तारीख का सबसे बड़ा अलमिया यह है कि बातिल हमेशा तलवार से कम और प्रोपेगंडे से ज़्यादा जीतने की कोशिश करता है। यज़ीद जानता था कि हुसैन (अ) को क़त्ल करना आसान है, मगर हुसैन (अ) के पैग़ाम को ख़त्म करना मुश्किल है, इसलिए उसने पहले लोगों के ज़हन ख़रीदे, ज़मीर सुलाए, दीन को दरबार का गुलाम बनाया, और फिर कर्बला बरपा हुई।

आज ग़ज़ा के मलबे तले दबे हुए बच्चों की चीखें पूरी उम्मत-ए-मुस्लिमा के ज़मीर की परीक्षा हैं। एक तरफ भूख से बिलखते मासूम बच्चे हैं, जिनके हाथों में खिलौने नहीं बल्कि कफन हैं, और दूसरी तरफ वह मुस्लिम हुक्मरान हैं जिनके महलों में रौशनी की चमक कम नहीं होती। मस्जिद-ए-अक्सा की हुर्मत पामाल हो रही है, मगर बहुत सी ज़बानें सिर्फ इसलिए ख़ामोश हैं कि कहीं वॉशिंगटन नाराज़ न हो जाए।

ईरान ने जब अमेरिका व इस्राइल के सामने सर झुकाने से इनकार किया, फ़िलस्तीन की हिमायत को अपना दीनी और इंसानी फर्ज़ क़रार दिया, और प्रतिरोध को ज़िंदा रखा, तो उसके ख़िलाफ़ सिर्फ मग़रिब ही नहीं बल्कि इस्लामी जहान के अंदर मौजूद बहुत से दरबारी ज़हन भी खड़े हो गए। यही वह नुक़्ता है जहाँ तारीख फिर से कर्बला की याद दिलाती है। उस वक़्त भी हुसैन (अ) के मुक़ाबिल सिर्फ यज़ीद नहीं था, बल्कि वह तमाम ख़ामोश लोग भी थे जिन्होंने हक का साथ देने के बजाय अपनी दुनिया बचाई।

आज भी उम्मत का एक बड़ा तबका हक को हक कहने से डरता है। कुछ लोग अमेरिका को "अमन का ज़ामिन" कहते हैं, इस्राइल को "हक़ीक़त" मानने का मशवरा देते हैं, और मुक़ावमत को उम्मत का मसला नहीं बल्कि राजनीतिक विवाद क़रार देते हैं। यह वही ज़हनियत है जो कल इब्ने साद के लश्कर में थी; नमाज़ भी पढ़ती थी, क़ुरआन भी सुनाती थी, मगर वक़्त-ए-इम्तिहान हुसैन (अ) के मुक़ाबिल खड़ी थी।

लेकिन तारीख का दूसरा रुख भी हमेशा ज़िंदा रहा है। हर दौर में कुछ लोग ऐसे ज़रूर रहे हैं जो भीड़ के शोर में भी हक की आवाज़ पहचान लेते थे। कर्बला में हबीब इब्ने मुज़ाहिर (र) थे, कूफ़ा के ज़िंदानों में मैस्म-ए-तम्मार (र) थे, फिरऔन के दरबार में मोमिन-ए-आले-फिरऔन था, और आज भी ग़ज़ा का मलबा, लेबनान की सरज़मीन, यमन का सब्र, और ईरान का मुक़ावमत कुछ ऐसे ही किरदार ज़िंदा हैं जो दुनिया की ताक़तों से नहीं डरते।

ख़ुदा हमें उन लोगों में शामिल फरमाए जो हुजूम के शोर में भी हक की सदा पहचान लें, जो अक्सरियत के फरेब में न आएं, और जो हर दौर के हुसैन (अ) के साथ खड़े होने का हौसला रखते हों।

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